अधूरा कैनवास

जिंदगी के कैनवास पर
अनगिनत रंग बिखरते रहे
वक़्त के साथ-साथ कभी
निखरते रहे कभी बिखरते रहे।

जिंदगी में हर शख्स कुछ
सीखा कर चला गया
इसीबीच दोस्तों का भी दौर
गुबार बन कर उड़ गया।
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प्यार के वो अनमोल पल
सुनहरा रंग भर गए
जिंदगी के कैनवास पर
सुकून का रंग दे गए।

कभी थी स्याह सी जिंदगी
उड़ेली तब उम्मीद की रोशनाई
ऐसे ही रंगों के संग खेलते
हमने पूरी जिंदगी थी बिताई।
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अकेलापन का ये धूसर रंग
मानो जिदंगी करे बदरंगी
भिगोकर यादों की बारिश में
लगे यही सावन की बदली।

जिंदगी के अंत में आज भी
कैनवास अधूरा सा दिखा
अनगिनत रंग होते हुए भी
विश्वास का रंग न दिखा।
अपर्णा शर्मा
August 7th,2026

4 thoughts on “अधूरा कैनवास

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  1. अपर्णा जी, आपकी कविता पढ़ते हुए लगा जैसे ज़िंदगी ने अपने पुराने संदूक से कुछ रंग निकाले हों कुछ रिश्तों की महक लिए, कुछ बिछड़ने की धूल से सने हुए, और कुछ उन आँखों के आँसुओं में भीगे हुए जिन्हें कभी किसी ने पढ़ा ही नहीं।

    सबसे देर तक वही आख़िरी पंक्ति भीतर ठहरी रही “विश्वास का रंग न दिखा।”
    शायद उम्र भर कैनवास पर रंग भरते-भरते इंसान अंत में यही समझता है कि कुछ रंग बाहर से नहीं मिलते; उन्हें किसी के दिल में उतरकर कमाना पड़ता है।

    आपकी कविता में बीती हुई ज़िंदगी की वह उदासी है, जो रोती नहीं, बस चुपचाप खिड़की के पास बैठकर बारिश देखती रहती है।
    बहुत मार्मिक… बहुत भीतर तक उतर जाने वाली रचना। 🌹

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