गाँव बसा है तन मन में
हर दम संग में जीता है
शुरुआत में पढ़ा गॉव से
माँ का आँचल भी गीला है
यही तो मन का फेरा है।
शहर में जब से आया
सपनों का पीछा करता है
अपनों के संग रहना चाहा
तो सपनों से नाता टूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।
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पढ़-लिख,नाम करा बाबा का
बाबा से भी नाता टूटा है
देश-विदेश खूब नाम कमाया
शहर तो अपना छूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।
इतना सब कुछ पाया कमाया
कहीं न रच बस पाया है
सेवानिवृत हो,सब छोड़–छाड़ के
घर को वापिस आया है
यहीं तो मन का फेरा है।
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सुबह खेत,शाम हाट करे है
सारे संगी घर को आए हैं
बचपन को भरपूर जिए है
फिर से समय फिराया है
यहीं तो मन का फेरा है।

घर से निकले वापिस घर को आए ये ही सपनों का फेरा हैं।
बहुत सुंदर रचना है।
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हार्दिक धन्यवाद
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बहुत ही सुन्दर तरह से लिखा गया है
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हार्दिक आभार
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