निकले थे,शिकायतों का बोझ लेकर
वो क्या ही मुस्कुराए कि
शिकायतें गुम थी उस मुस्कान पर।
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निकले थे,मुलाकात को आखिर करने
पर शुरु हुई मुलाक़ातों की सिलसिलेवारी.
फ़िदा हुए थे उन पर इस कदर।
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निकले थे,एहसासों के समंदर में डूबते, तैरते
जब बात हुई यथार्थ भरे आगत की
कल्पनाएं पा गई थी तत्क्षण आकार।
अपर्णा शर्मा
Oct.16th,2026
वज़ूद
मैं जोड़ता रहा,अपना वजूद उसके वज़ूद से
वो तोड़ता रहा,मेरे वज़ूद को मेरे वज़ूद से।
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जब हो गया मैं,अपने वज़ूद से बिल्कुल खाली
अब ढूँढ रहा हूँ अपना वज़ूद उसके वज़ूद में।
अपर्णा शर्मा
Oct.13th,2026
खतों का ज़माना
वो नीले से खत
पीले से लिफाफे
लिखते थे आपबीती
वो गुजरे ज़माने।
एहसासों के समंदर
बांधकर शब्दों में
बांचते ही खत, समंदर
बहता था आँखों में।
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खत को संजोया
कभी अमूल्य वस्तु सा
कभी फाड़कर जला
धधका था चिता सा।
समय के उस चक्र में
बीत जाते थे हफ्ते
तब जाकर मिलते थे
हाल अपनों के।
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उन खतों को लाता था
खाकी पहने डाकिया
उसका मुकाबला क्या करेंगी
ये आज की तकनीकिया।
अपर्णा शर्मा
Oct.9th,2026 (डाक दिवस पर)
