जीवन निर्माण को
माँ के हिस्से
सदा रही
नदियां
रेशम
ममता
और
मखमली एहसास
संग
गले में झूला
झूलता नादां
ता-उम्र बचपन.
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पिता ने चुन
लिया
पर्वत
प्रस्तर
खद्दर
और
दायित्व
संग
हर लक्ष्य को
तैयार
जिम्मेदार व्यक्तित्व.
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कभी-कभी
होता है इसका
प्रतिकूल भी.
अपर्णा शर्मा
July 3rd, 2026
सोच
दूर जाता हर शख्स सोचता रहा चला जाऊँगा बहुत दूर कि दुनिया बहुत बड़ी है।
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मिलने को आतुर वो नादां कहता रहा मिलेंगे ज़रुर कि दुनिया बहुत छोटी सी है।
अपर्णा शर्मा
June30th,2026
प्रेम ऐसा भी
वो सफर पर अकेला था
वो वहीं पर अकेली खड़ी
बस यह वज़ह रही जीने की
वो थी प्रेम की सुनहरी लड़ी.
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वक़्त के बीतते-बीतते
दोनों बढ़ चले अपने रास्ते
पर आज भी वज़ह है वहीं
दोनों के प्रेम की सुनहरी लड़ी.
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न मिलने की अभिलाषा
न विरह का कराहना
मौन जीवन में वज़ह वहीं
दोनों के प्रेम की सुनहरी लड़ी.
अपर्णा शर्मा
June 26th,2026
