अनकही बातें

ज्यों ज्यों जिंदगी बढ़ रही
अकेलेपन को समझ रही
त्यों त्यों बहुत सी अनकही
अपनी अपनी ही कह रही।

कुछ बातें जो नुक्कड़ पर छोड़ी
कुछ बड़ी खूबसूरती से थी मोड़ी
अब सभी आवाज देकर बुलाती
आज भी वो उसी जगह थी ठहरी।
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अंधेरा और अकेलापन इन्हें खूब भाता
अनकहे किस्सों का डेरा जम ही जाता
वो लम्हा ,सुकून का पल दे कर
अनकहा संतुष्ट सा फिर नजर आता।

कभी महफ़िलों के बेहद शोर में 
कह दिए गर ये अनकहे किस्से
रूठ कर दूर बैठ जाते हैं ये हमसे
जैसे पराए हो गए हों अब किस्से।
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अनकहा कभी कभी चुभता है दिल में
एक मुलाकात का फासला रहता है दिल में
हो मुलाकात और कह दे सब अनकही बाते
ठिठक कर घर कर गई है जो मन में।
अपर्णा शर्मा
March 20th,2026

दो पंक्ति

आजकल विचार किसी कोने में छुप से गए हैं
कलम भी सच लिखने में झिझकती बहुत है।
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सच यह है, कि सच को पढ़ना,कोई आसान नहीं
लेकिन झूठ को सच सा लिखने में मुश्किल बहुत है।
अपर्णा शर्मा
March17th, 2026

ख्वाबों का जंगल

एक सुनहरी पगडंडी पर
निकला था वो सकुचा कर
ख़्वाब बसे थे उस रस्ते
चलता था वो इतरा कर।

धीरे-धीरे ख्वाबों के भी
उपजे थे उसमें अंकुर भी
ख्वाबों की नाजुक कोंपल सी
बसी थी दुनिया अंतरंगी सी।
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डगमग डगमग चलता जाता
ख़्वाब वनों का बसता जाता
कभी बसंत सा, कभी हेमंत सा
उसका ख़्वाब निखरता जाता।

घने ख़्वाब के जंगल में
खोया था अपनी ही धुन में
तभी जेहन में बिजली कौंधी
बहुत दूर था अपनों से।
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हर ख़्वाब पर फूल खिले थे
फूलों की खुशबू से महके थे
कीमत उसने बड़ी चुकाई
सारे ख़्वाब सच करने में।
अपर्णा शर्मा
March13th, 2026

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