हिमशिला सी ठहरी यादें
सर्द हवा में सिकुड़ी यादें
बसंती हवा के बहते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
पतझड़ सी शुष्क थी जो यादें
इधर-उधर को छितरी वो यादें
नव कोंपल के खिलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
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भावों में डूबी गहरी यादें
शब्दों को खोजती यादें
भावों के शब्दों में ढलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
कोहरे की सुबह सी यादें
धुंधली सी दिखती थी यादें
माघी सूरज के चमकते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
अपर्णा शर्मा
Feb.27th,2026
ऋतु पर्व
मकर संक्रांति से पूर्व की रात्रि
शरद ऋतु की अंतिम दीर्घ रात्रि।
लोहड़ी का पर्व मनाते,गाते बधाइयाँ
बाँटते रेबड़ी,मूँगफली,गिद्दे पाती लड़कियां।
लकड़ी,कंडे सजी लोहड़ी,और दूल्ला भाटी की कहानी
बहू बेटियों को आशीषों से नवाजती दादी नानी।
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खूब उत्साह से परिपूर्ण होती लोहड़ी की रात्रि
अभ्यागत प्रातः,सूर्य की मकर राशि में होती संक्राति।
उत्तरायण को तत्पर आज से ही प्रत्यक्ष प्रभु
पोंगल, बिहू, अनेकों नाम से पूजे जाते भानु।
खिचड़ी,तिल,गुड़ खाने और दान की पुरातन परिपाटी
वहीं रंग-बिरंगी पतंगे,पर्व में पूर्ण उत्साह भरती रीति।
नई ऊर्जा से दीप्त हम कर रहे उत्तरायणी सूर्य का स्वागत
नई ऋतु,नई फसलों का उत्सव मन रहा अवनी से अंबर तक। अपर्णा शर्मा Jan.13th,23
दो पंक्ति
कर्मों को दुत्कार कर
चाहता रहा अधिकार
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जबकि काबिल को भी
मिलता रहा तिरस्कार।
अपर्णा शर्मा
Feb.24th,26
बता! जिंदगी तू और बता
पतझड़ सा तू खूब सताती रही
कभी सदाबहार सी खिलती रही।
बसंत की मीठी सुगंध महक रही
कभी पतझड़ की उदासी छाई रही
तेरे इन अंदाज पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू शरारतें कर शोखियाँ दिखाती रही
कभी बुलबुला बन कर बिखरती रही।
ठोकरों में तू हमेशा संभालती रही
कभी मंजिल देकर, तू छीनती रही
तेरे इस व्यापार पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू अपने इशारों पर नचाती रही
रुला कर भी,कभी हँसाती रही।
प्यार के पलों की उम्र कम ही रही
यादों के संग तू खूब जीती रही
तेरे इस नखरे पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
अपर्णा शर्मा
Feb.20th, 2026
