हिमशिला सी ठहरी यादें
सर्द हवा में सिकुड़ी यादें
बसंती हवा के बहते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
पतझड़ सी शुष्क थी जो यादें
इधर-उधर को छितरी वो यादें
नव कोंपल के खिलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
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भावों में डूबी गहरी यादें
शब्दों को खोजती यादें
भावों के शब्दों में ढलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
कोहरे की सुबह सी यादें
धुंधली सी दिखती थी यादें
माघी सूरज के चमकते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
अपर्णा शर्मा
Feb.27th,2026

अपर्णा जी ,
हिमशिला सी जमी हुई स्मृतियों में
आपने जो ताप भरा है,
वह केवल प्रेम नहीं
वह प्रतीक्षा की तपस्या है।
पतझड़ के सूखे पत्तों सी बिखरी यादों को
आपने बसंती स्पर्श दिया,
और देखिए
शब्दों में फिर से हरियाली लौट आई।
कोहरे की धुंध में खोई कहानी
जब माघ के सूरज सी दमकी,
तो लगा जैसे स्मृति नहीं,
स्वयं हृदय बोल उठा हो।
आपने सही लिखा
यादें मरती नहीं,
वे ऋतुएँ बदलती हैं…
और हर बसंत में
प्रेम फिर से जन्म लेता है।
🙏🙏🙏
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भाव विभोर करती सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद.
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sunder
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Thank you
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