एक मुलाकात

निकले थे,शिकायतों का बोझ लेकर
वो क्या ही मुस्कुराए कि
शिकायतें गुम थी उस मुस्कान पर।
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निकले थे,मुलाकात को आखिर करने
पर शुरु हुई मुलाक़ातों की सिलसिलेवारी.
फ़िदा हुए थे उन पर इस कदर।
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निकले थे,एहसासों के समंदर में डूबते, तैरते
जब बात हुई यथार्थ भरे आगत की
कल्पनाएं पा गई थी तत्क्षण आकार।
अपर्णा शर्मा
Oct.16th,2026

वज़ूद

मैं जोड़ता रहा,अपना वजूद उसके वज़ूद से
वो तोड़ता रहा,मेरे वज़ूद को मेरे वज़ूद से।
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जब हो गया मैं,अपने वज़ूद से बिल्कुल खाली
अब ढूँढ रहा हूँ अपना वज़ूद उसके वज़ूद में।
अपर्णा शर्मा
Oct.13th,2026

सब्र

सब्र इतना ही देना ऐ खुदा, जो इज्ज़त पर आँच न आए।
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साबीर* को ये दुनिया अक्सर कमजोर समझ लेती है।
धैर्यवान*
अपर्णा शर्मा
Oct.6th,2026

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