जब कभी कवि मन लिखता सामाजिक मुद्दों को
भावनाएं उद्वेलित हो हलचल करती चितवन को
बिटिया का प्रभुत्व लिखना चाहे जब भी कलम
पक्षपाती का इल्ज़ाम झेल, छुपाता रहता कवि अपने को.
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जब भी कवि ने बेरोजगारी लिखनी चाही
महंगाई ने गर्दन टेढ़ी कर उस को दिखलाई
शिक्षा और चिकित्सा की बदहाली पर जब लिखा
राजनीतिक कविता के तमगे की तब ही जिल्लत पाई.
कविता में जब लिखा प्रकृति के सौंदर्य को
अलौकिक उपमाओं से नवाज़ा तब रचना को
गर लिखा प्राकृतिक शोषण का विस्तार कभी
विकास का शत्रु तब-तब माना गया कवि को.
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अधिकांशतः कवियों की भांति मनोहर विषयों पर लिखकर
नित, नए प्रपंचों और विवादों से यूँ चुपके से बचकर,
छोड़ दी प्रश्न और चिंताओं की अनेकों रचनाएं अधूरी
गर्व से सम्मान पा गए वो एक सच्चे कवि बनकर.
अपर्णा शर्मा Sept. 4th,2026
धागा
कच्चे सूत से बना
लाल और पीला रंगा
बांध कर वृक्षों पर
बना मन्नतों का धागा.
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आस्था में भिगा
ईश्वर को चढ़ाया
और कहलाया
विश्वास का धागा.
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बहन ने वहीं धागा
कलाई पर जब बाँधा
भाई ने माना,धागा है
प्यारा सा बंधन.
अपर्णा शर्मा
Aug.28th,2026
सावन में मन
अंतर्मन में मेघा बरस रहे
अंगना अब भी सूखा है
बादल खूब छाए घनेरे
आँगन आस में डूबा है।
अंधियारी संग छाए बदरा
जरुर बरस कर जाएगें
मौन खड़े वृक्ष,उपवन भी
जैसे तन-मन भी तर जाएंगे।
जाने कितने बरस है बीते
बिन बहनों के घर सूना है
बिटिया भी बहना ही होगी
मन बारिश सा बरसा है।
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कितने सावन चले गए
वो सावन कब आएगा
जब झूमेंगें मस्त मगन हो
मेघा प्यार बरसाएगा।
अपर्णा शर्मा
August 14th,2026
