जब कभी कवि मन लिखता सामाजिक मुद्दों को
भावनाएं उद्वेलित हो हलचल करती चितवन को
बिटिया का प्रभुत्व लिखना चाहे जब भी कलम
पक्षपाती का इल्ज़ाम झेल, छुपाता रहता कवि अपने को.
https://ae-pal.com/
जब भी कवि ने बेरोजगारी लिखनी चाही
महंगाई ने गर्दन टेढ़ी कर उस को दिखलाई
शिक्षा और चिकित्सा की बदहाली पर जब लिखा
राजनीतिक कविता के तमगे की तब ही जिल्लत पाई.
कविता में जब लिखा प्रकृति के सौंदर्य को
अलौकिक उपमाओं से नवाज़ा तब रचना को
गर लिखा प्राकृतिक शोषण का विस्तार कभी
विकास का शत्रु तब-तब माना गया कवि को.
https://ae-pal.com/
अधिकांशतः कवियों की भांति मनोहर विषयों पर लिखकर
नित, नए प्रपंचों और विवादों से यूँ चुपके से बचकर,
छोड़ दी प्रश्न और चिंताओं की अनेकों रचनाएं अधूरी
गर्व से सम्मान पा गए वो एक सच्चे कवि बनकर.
अपर्णा शर्मा Sept. 4th,2026

Leave a comment