जिंदगी के मकड़जाल में यूँ फ़ंसा
हरबार वक़्त की चाल में मैं कसता रहा।
एकांत में देर तक बस यहीं सोचता रहा
क्यूँ कर मैं ही हर बार जाल में फंसता रहा।
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जिन समस्याओं का समाधान सामने था खड़ा
नाहक ही उन फैसलों से मुँह मोड़ता रहा।
जिंदगी के सभी झंझावात से लिपट कर
नाहक सुकून के पल यूँ ही गवांता रहा।
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सब छोड़ कर दूर निकलते निकलते
वक़्त को हर वक़्त यूँ ही टालता रहा।
छोड़ यार कह कर मुकरने के दिन गए अपर्णा
अब वक़्त पर वक़्त को जवाब देने का वक़्त आ रहा।
अपर्णा शर्मा
April17th,2026
खनकती चूड़ियां
सूरज के उगने से पहले
चिड़ियों के कलरव से पहले
उठ जाती,माँ के हाथों की चूड़ियां
खूब खनकती चूड़ियां।
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घर के हर कोने-कोने में
हर काम के पूरे होने में
माँ की हर आहट पर
खूब खनकती चूड़ियां।
छन छन कर गीत सुनाती
भोजन में स्नेह रस मिलाती
मधुर आवाज की तान सी
खूब खनकती चूड़ियां।
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भगिनी के हाथों में अल्हड़पन सी
भाभी के हाथों में मर्यादित सी
माँ की ममता से भरी भरी
खूब खनकती चूड़ियां।
श्रृंगार चूड़ी बिन रहे,सदा अधूरा
जैसे बिन बासंती, बसंत हो बौरा
रंग बिरंगी काँच की नाजुक
प्रेम चिन्ह है ये चूड़ियां।
अपर्णा शर्मा
April 4th,2026
शब्दों का उपवन
शब्दों के मनहर उपवन में
जब पुष्प खिले हो भावों के
छंदो के कोमल वृअंतों पर
तब अर्थ हिलोरें लेते हैं।
भीगे अंतस जब मधुरस से
पोर पोर तक युवा रचना से
ताजापन बिखरे छंद छंद पर
शब्द संयोजन झोंके लेते है।
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कभी-कभी तीखे कन्टक से
हृदय में धँसते जो शूलों से
वो नागफनी से है, बगीचे में
जो उत्तम पाठ पढ़ाते हैं।
कोमल,कोमल, छितरे, छितरे
शब्द उपवन में बिखरे,बिखरे
अमलतास सी रचना बनकर
शब्द उपवन को रोशन करते हैं।
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ऐसे ही शैली के पारंगत कवि
अपनी रचनाओं की लेकर छवि
गीतों को दिल तक पहुंचाकर
शब्द उपवन में महका करते हैं।
अपर्णा शर्मा
March27th,2026
