ठहराव भी वाजिब है

सफर है यह जिंदगी,जहाँ है हज़ारों उलझने
जब भी मौका मिले सफर में ठहराव भी वाजिब है।

अगर कोई हद से ज्यादा दिखाए अपनापन
तो सफर में कुछ हादसा होना लाज़िम है।
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जरूरी नहीं इस सफर में सामान पर डाका पड़े
एहसासों का खजाना लुटना भी शामिल है।

नरम दिल ऐसे ही हर पड़ाव में न लुटते रहे
ठहर कर सोचो,क्या दुनिया एहसासों के काबिल है ?
अपर्णा शर्मा
June 12th,2026

दो पंक्ति

इंतजार की घड़ी से जार जार होकर
आँखे थक गई कब से बेजार होकर
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खुद_ब-खुद जब ख्वाबों से हुई गुफ़्तगू 
पलकें झुक गई ख्वाब को सच समझ कर।
अपर्णा शर्मा
June 10th,2026

अवसाद के दिनों में

निकल पड़ो तुम अपनी धुन में
मंजिल खुद ही दिख जाएगी
छोड़ो डरना मन ही मन में
कि ये राह किधर को जाएगी।
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याद करो वो बचपन के दिन
हर कदम बढ़ते बढ़ते था डुगलाया
फिर भी चलते-चलते कब सोचा
कि ये राह किधर को जाएगी।

जब जब दौर चला मुश्किल का
तब तब नया रस्ता था आजमाया
ऐ दिल क्यूँ है तू डूबा डूबा सा
कि ये राह किधर को जाएगी।
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वक़्त कभी न ठहरा है
ये वक़्त भी गुजर जाएगा
क्यूँ सोच सोच कर हैरां है
कि ये राह किधर को जाएगी।
अपर्णा शर्मा
June 5th, 2026

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