वो ढूंढता रहा इश्क
हो कर दर ब दर
मिलता रहा प्रेम
स्वार्थ में लिपट कर।
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कभी जरुरत तक
कभी छले जाने तक
और कभी इश्क उतरा
जान कर असलियत।
कभी सरलता के आवरण में
कभी सरसता के लावण्य में
ठगता रहा हर कदम इश्क
मासूम दिलों को बहला कर।
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काश किसी को ग़र इश्क मिले
इत्तला जरुर हो उस मासूम को
जो आज भी बदहवास सा हुआ
दर ब दर ढूंढ रहा इश्क को।
अपर्णा शर्मा
June19th,2026

अपर्णा जी,
आपकी कविता पढ़ते हुए लगा जैसे इश्क किसी मंज़िल का नाम नहीं, बल्कि एक लंबी भटकन का दूसरा नाम है। हम अक्सर प्रेम समझकर जिन रिश्तों को सीने से लगाते हैं, उनमें कहीं न कहीं स्वार्थ की महीन परतें छिपी होती हैं, और जब वे परतें उतरती हैं तो दिल को अपने ही विश्वास का शोक मनाना पड़ता है।
“वो ढूंढता रहा इश्क हो कर दर-ब-दर” यह पंक्ति केवल किसी एक व्यक्ति की कथा नहीं, उन तमाम रूहों की दास्तान है जो प्रेम को पाने से पहले उसकी परछाइयों से बार-बार ठगी जाती हैं।
आपने इश्क को एक ऐसे मुसाफ़िर की तरह चित्रित किया है जो हर चेहरे में अपना घर खोजता है, और हर बार थोड़ा-सा टूटकर आगे बढ़ जाता है। कविता में एक उदास सच्चाई है, लेकिन उसी के भीतर प्रेम की तलाश का अटूट विश्वास भी धड़कता है।
बहुत देर तक मन इन पंक्तियों के साथ चलता रहा।
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आप के प्रोत्साहन और सराहना हेतु हृदय से धन्यवाद.
कविता जिस भाव में लिखी गई,उस के भाव को आप ने वैसे ही अनुभव किए हैं.
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