अवसाद के दिनों में

निकल पड़ो तुम अपनी धुन में
मंजिल खुद ही दिख जाएगी
छोड़ो डरना मन ही मन में
कि ये राह किधर को जाएगी।
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याद करो वो बचपन के दिन
हर कदम बढ़ते बढ़ते था डुगलाया
फिर भी चलते-चलते कब सोचा
कि ये राह किधर को जाएगी।

जब जब दौर चला मुश्किल का
तब तब नया रस्ता था आजमाया
ऐ दिल क्यूँ है तू डूबा डूबा सा
कि ये राह किधर को जाएगी।
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वक़्त कभी न ठहरा है
ये वक़्त भी गुजर जाएगा
क्यूँ सोच सोच कर हैरां है
कि ये राह किधर को जाएगी।
अपर्णा शर्मा
June 5th, 2026

2 thoughts on “अवसाद के दिनों में

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