कशमकश

अजीब सी कशमकश में जी रहे हैं वो
हर नज़र को नज़रअंदाज कर रहे हैं वो।
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जो कभी देखते ही,एक दूसरे को गले लगते थे
मन से कोमल पर,बाहर से सख्त हो रहे हैं वो।

अपर्णा शर्मा jan.20th,2026

2 thoughts on “कशमकश

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  1. बहुत सुंदर और मार्मिक अभिव्यक्ति, अपर्णा शर्मा जी।
    आपकी पंक्तियाँ उस नज़ाकत और अंतराल को बयाँ करती हैं जो दिल में होने वाले बदलते भावों को दिखाती हैं; भीतरी कोमलता और बाहरी दृढ़ता का संगम।

    भीतर कोमल, बाहर सख्त
    अजीब कशमकश में जी रहे हैं वो,
    हर नज़र को नज़रअंदाज कर रहे हैं वो।
    जो कभी देखते ही गले मिल जाते थे,
    अब मन से कोमल, बाहर से सख्त हो रहे हैं वो।
    छुपा रहे हैं अब अपने जज़्बात का रंग,
    पर दिल में धड़कते हैं पुराने संग।
    अजीब सा यह बदलता हुआ खेल,
    भीतर की गर्मी और बाहर की ढाल संग मेल।
    विजय श्रीवास्तव

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