जब कि युद्ध का अंत, वार्तालाप में ही है।
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तब भी वार्तालाप से पहले,युद्ध ही है।
अपर्णा शर्मा
April8th,2026
दो पंक्ति
श्रेष्ठ दिखने की चाह में सरलता खोती रही
सरलता के साथ ही,सत्यता भी धुँधलाती रही।
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इस प्रचलन पर सवाल सा उठता है बहुधा
श्रेष्ठता के बोझ तले मनुष्यता ही अब खो रही। अपर्णाशर्मा March 31st
आखिर
हर बार आवाज ने ओढ़ ली खामोशी की चादर
महत्वकांक्षा भी देता रहा संतोष को ही सत्कार।
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कुछ इस तरह जिंदगी में आता रहा ठहराव का अतिभार
आखिर,
ठहराव ने फिर चुना आवाज को ही हथियार।
अपर्णा शर्मा
March24th,2026
