अब इसकी सजा क्या दोगे?

सुनो! प्रकृति

बिसरती नदियां
बिखरती प्रलय।
फैलती सड़के
सिमटते अरण्य।
बढ़ते पर्यटक
घटता हिमालय।
अब इसकी सजा क्या दोगे?
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सुनो! समाज

सिकुड़ते घर
बढ़ते खर्च।
घटते विद्यालय
बढ़ते कुतर्क।
घटते उत्सव
बढ़ते अपकर्ष।
अब इसकी सजा क्या दोगे?
अपर्णा शर्मा
Jan.16th,26

6 thoughts on “अब इसकी सजा क्या दोगे?

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  1. अपर्णा शर्मा जी, आपकी कविता ने सीधे सोचने पर मजबूर कर दिया!
    प्रकृति और समाज के बदलते स्वरूप को आपने बेहद संक्षिप्त और प्रभावशाली शब्दों में उतारा है।

    हर पंक्ति चेतना जगाती है और यह सवाल खड़ा करती है, हमारे कर्मों की सजा क्या होगी, और क्या हम बदलाव के लिए कदम उठाएँगे। 🙏

    सच में, यह कविता जागरूकता और चिंतन की मिसाल है।

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  2. बहुत मार्मिक कविता, अपर्णा जी! प्रकृति और समाज की सच्चाई को इतने गहरे ढंग से उकेरा है—सजा तो हमें ही भुगतनी पड़ेगी।

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