आईने में हो तुम

कभी तुम्हीं आईना थे
अब आईने में हो तुम
संवारता रहा मुझे आईना
उसमें दिखते रहे हो तुम।
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नयनों में गहराता काजल
यादों का लहराता बादल
सुर्ख होते गालों की लाली
आईना कहे सारी हालत।

केशविन्यास करुँ तब ये अलकें
न सुलझे,न संवरे ये काली जुल्फें
तेरी धुन पर करती ता ता थईया
आईने में ये अदा खूब ही झलके।
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प्रेयसी का बस एक निवेदन
सारे श्रृंगार तुझको ही अर्पण
आ जाओ,कहती ये धड़कन
शायद बोल उठे आज ये दर्पण।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th, 2026

6 thoughts on “आईने में हो तुम

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  1. अपर्णा जी आपकी यह रचना सचमुच आईने को साक्षी बना कर प्रेम की अंतरंगता को अत्यंत कोमल ढंग से उकेरती है।
    आईना यहाँ केवल प्रतिबिंब नहीं, बल्कि प्रिय की निरंतर उपस्थिति और संवाद बन जाता है।
    पहले ही पद में
    “कभी तुम्हीं आईना थे…”
    प्रेम के उस चरण को छू लिया गया है जहाँ प्रिय ही आत्म-परिचय का माध्यम बन जाता है। यह पंक्ति बहुत गहरी है।
    काजल, लाली, जुल्फ़ें और “ता-ता थईया” श्रृंगार के ये बिंब केवल सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि प्रेम में डूबी स्त्री की चंचल चेतना को जीवंत कर देते हैं। भाषा स्वाभाविक, प्रवाहमयी और दृश्यात्मक है।
    अंतिम स्तोत्र में
    “शायद बोल उठे आज ये दर्पण”
    आईना मानो प्रेम का देवता बन जाता है जो अब मौन नहीं रह सकता। यह बहुत सुंदर भावांत है।
    समग्रतः यह कविता श्रृंगार, स्मृति और समर्पण का संतुलित संगम है।
    सरल शब्दों में गहरी अनुभूति यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

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    1. आदरणीय आप के द्वारा कविता की मनोहर प्रशंसा और अद्भुत समीक्षा हेतु हृदय से धन्यवाद 🙏

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