बसंत और प्रेम

हृदय में बसते हों तुम
नयनों में दिखते हो तुम  
आँखों में छुपी है भेंट हमारी
साँसे कहती कब आओगे तुम।
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तुम बिन सूनी हुई सब बतिया
अब न भाती मुझको सखियाँ
मुझमें अब,तुम ही,तुम बसे हो
तुम तक सिमटी है मेरी दुनिया।
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आओ! मुझको गले लगाओ
विकट विरह को परे हटाओ
रस्ता तकती अब सूखी अखियां
सुप्त हृदय में प्रेम लौ जलाओ।
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,2026

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