मूल भाव

पुष्प, शाख,पात सभी सर्द से जड़ हुए शिशिर में
फिर खिलेंगे, महक ही पहचान बनेगी बसंत में।

हिम हुआ हिमालय,आदित्य के वियोग में
फिर प्रवाह बढ़ेगा, प्रकाश की वृद्धि में
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जुदा हो गया दोस्त, जो बसा था उसके जिगर में
पर दोस्ती आज भी जिंदा है,उसकी हर फ़िकर में।

समय के सैलाब में खो दिया, उसने अपने महबूब को
मोहब्बत पर नाज़ कर, मानता है वो हर उसूल को।
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कभी-कभी बदल जाते हैं, व्यवहार रिश्तों में
नहीं बदलता पर, मूल भाव किसी रिश्ते में।
अपर्णा शर्मा
Jan.9th,2026

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