यूँ तो बहुत दिनों से चल रही थी तैयारियां
समेट कर रख ली थी अपनी लकुटी कमरिया
धीरे धीरे उम्र का तकाजा बढ़ाती रही बीमारियाँ
जी ली थी,फिर से उसी में,सारी नासमझियां।
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वालदैन का अपने ही बच्चों को वालदैन बनाना
जैसे फिर से बचपन पर आकर ठहर जाना
जी कर पूरी ज़िंदगी ज्यूं हो दुनिया का चक्कर
और एक सुबह चुपके से अलविदा कर जाना।
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रुके हुए सब जज़्बातों का बह जाना
यादों का कसकर दिल से जकड़ जाना
ज़िंदगी ऐसे ही चलती वो रुकती नहीं
धीरे से,वो वज़ूद अपने में समा जाना।
अपर्णा शर्मा
Oct.10th, 25

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