बाकी सब बेमानी

सब खेल यहाँ, बातों के आकर्षण का
सम्मान से मिली अपनी स्वीकार्यता का
दिमाग फिर अस्थिर सा,डोले,डोले रहता है
अदने से दिल के आगे,बाकी सब बेमानी लगता है।
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जिस दिन अस्वीकार किया इस दुनिया ने
सच में विश्वास नहीं रहता इस दुनिया में
दिल असीम दुख के सागर में डूबा डूबा रहता है
तब दिमाग ही काम करे, बाकी सब बेमानी लगता है।

स्वीकार,अस्वीकार दो पलड़े जीवन के
कभी एक झुके, कभी दूजा हल्कापन आए
दिल, दिमाग के तराजू में तुलते रहते हैं
बातों के आगे, भावों का भाव बेमानी है।
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जाने कितने रिश्ते, धागे जैसे उलझ रहे
सुलझे ग़र, और रिश्ते भी बिगड़ रहे।
कुबूल है या नहीं सोचे बिन, जीवन में बढ़ते रहते हैं
रिश्तों के आगे,बातों का चुभना ,लगता सब बेमानी है।
अपर्णा शर्मा
Sept.20th,24

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