बस अब और नहीं

कभी दूर-दूर तलक फैली हरियाली
अब कहीं दूर तलक दिखती नहीं
प्यासी धरती,भूखे,तड़पते निरीह जीव 
जंगल बोले,मेरा दोहन बस अब और नहीं।

कल कल करती बहती थी जो नदियां
कंकर पत्थर से भरी लगती है पगडण्डियाँ
बूंदे,बारिश,बादल ये सब स्वप्न से हुए
प्रदूषित नदियां यही कहे,बस अब और नहीं.

सुखदायी शब्दों की बरसातें
लगती जैसे अनमोल सौगातें
शांत मन से सही को पहचानो
अंतर्मन की आवाज,बस अब और नहीं।

कल,और भी सुंदर कल में उलझा आज
उज्ज्वल आगत में डूबा हर सपने का साज
हरा-भरा वर्तमान दूर तलक दिखता नहीं
अब भविष्य कह रहा,बस अब और नहीं।
अपर्णा शर्मा
May10th,24

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