पर्वत (सहेज ले तुझे)

प्रस्तरों,शिलाओं गठित,शक्ति का प्रतीक,
अचलित,प्रहरी,नगपति रुक्ष सा सर्वथा गर्वित।

हरित आवरण, श्वेत किरीट शोभित तन में,
नदिया,झरने,पुष्प,लता धारित अलंकार से।
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नदियों,प्रवाह का उद्गम, संगम सब तेरे अंक में,
हर धारा शक्ति बसी है,हरीतिमा के रूप में।

पिता सा कठोर,दृढ़तामय रुक्ष सा आवरण,
हृदय माँ सा स्नेही,लुटाता निधि का भंडारण।
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चुहूं ओर बिखरी जड़ी-बूटियाँ,फूलों की घाटियाँ
अमृत सब समाए,फैली सर्वत्र इनकी ही सुरभियाँ।

देवभूमि है यही,खुलता अध्यात्म का द्वार,
पांडवों ने भी पाया था यहीं स्वर्ग का द्वार।

सभीगुणों का धनी,प्रकृति भी तुझ से परिपूर्ण,
सहेज ले तुझे,अन्यथा सृष्टि बनेगी अपरिपूर्ण।
अपर्णा शर्मा
June 16th, 23

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