श्रृंगार और सादगी



मानव और प्रकृति सदा से श्रृंगारित होती आई
अपने स्वगुणों से दोनों ने सदा पहचान बनाई।

मानव मन को श्रृंगार सदा खूब ही भाया
सो जन्म से मृत्यु तक गुणों को खूब बढ़ाया।

https://ae-pal.com

भोला,जिज्ञासु बालक,कभी लक्ष्य का पीछा करती,तरुणाई
स्त्री का ममत्व सा प्रबंधन,वहीं पुरुष की धीरजता,संतुष्टि लाई।

भद्रजनों का स्नेह भरा व्यवहार जीने की कला सिखाता
मन के श्रृंगार से तन की सुंदरता का उत्तम ज्ञान कराता।

गुणों में वृद्धि,सुंदरता में वृद्धि कर अवगुणों को मिटाती
मानवगुणों से सज कर श्रृंगार की सादगी मन को भाती ।

4 thoughts on “श्रृंगार और सादगी”

Add yours

Leave a Reply

Blog at WordPress.com.

Up ↑