वो नीले से खत
पीले से लिफाफे
लिखते थे आपबीती
वो गुजरे ज़माने।
एहसासों के समंदर
बांधकर शब्दों में
बांचते ही खत, समंदर
बहता था आँखों में।
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खत को संजोया
कभी अमूल्य वस्तु सा
कभी फाड़कर जला
धधका था चिता सा।
समय के उस चक्र में
बीत जाते थे हफ्ते
तब जाकर मिलते थे
हाल अपनों के।
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उन खतों को लाता था
खाकी पहने डाकिया
उसका मुकाबला क्या करेंगी
ये आज की तकनीकिया।
अपर्णा शर्मा
Oct.9th,2026 (डाक दिवस पर)

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