ख्वाबों का जंगल

एक सुनहरी पगडंडी पर
निकला था वो सकुचा कर
ख़्वाब बसे थे उस रस्ते
चलता था वो इतरा कर।

धीरे-धीरे ख्वाबों के भी
उपजे थे उसमें अंकुर भी
ख्वाबों की नाजुक कोंपल सी
बसी थी दुनिया अंतरंगी सी।
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डगमग डगमग चलता जाता
ख़्वाब वनों का बसता जाता
कभी बसंत सा, कभी हेमंत सा
उसका ख़्वाब निखरता जाता।

घने ख़्वाब के जंगल में
खोया था अपनी ही धुन में
तभी जेहन में बिजली कौंधी
बहुत दूर था अपनों से।
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हर ख़्वाब पर फूल खिले थे
फूलों की खुशबू से महके थे
कीमत उसने बड़ी चुकाई
सारे ख़्वाब सच करने में।
अपर्णा शर्मा
March13th, 2026

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