रंगों के इस मौसम में
अब रंग फीके से लगते हैं
फूलों के इस मौसम में
फूल भी कागज़ के दिखते हैं।
प्रेम रंग में डूबे इंसा
मुश्किल से ही दिखते है।
मानवता की बातें करने वाले
नफरत में डूबे रहते हैं।
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कच्चे रंगों के बाजारों में
पक्के रंग खो जाते हैं
रंगों पर दूजे रंग चढ़ते ही
पहले रंग धुंधले हो जाते हैं।
रंगों की बौछारों में भी
मन रीते ही रह जाते है
मन को उल्लासित कर दे
वो रंग बाजारों में न मिलते हैं।
अपर्णा शर्मा
March 6th,2026

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