शांत पड़े गहरे पोखर में आज हलचल मचती रही
यादों की कंकरी,पुरजोर आज शोर करती रही
जिन यादों को झील सा शांत समझ लिया था अपर्णा
उन यादों के बवंडर में ख़्यालों की सुनामी उठती रही।
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समय के साथ न जाने कब डगर बदलती रही
इसीके साथ मेरा जुनून और चाहत बदलती रही
जहन में शहर आज भी उसी जवानी में है
न जाने क्यूँ कर ये ख़्याल जीती रही।
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कभी शहर छूटने और जुड़ने की फिक्र न रही
छूटने की गमी,मिलने की खुशी की पैमाइश न रही
आज भी शहर का बसंत दिल में बसा है
छूटे हुए मोड़ देखने की कभी ख्वाहिश न रही।
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ख़्यालों के चौराहों की हर गली आबाद रही
ख्वाबों के नुक्कड़ पर टपरी भी गुलजार रही
अपने अंदाज में आज भी यादों को संजोए हुए
हर बात दिल ही दिल में क्यूं बात करती रही।
अपर्णा शर्मा Sept. 13th,24

Bahoot pyara😍😍😍
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