एक दिन बातों बातों में ,
मैं कह बैठी कि मैं तो सच ही बोलती हूँ ।
और तुम?
वो बोला, तुम से सच,पर झूठ भी बोलता हूँ ।
मैं फिर बोली,झूठ नहीं बोला करते यह गलत है ।
‘कुछ सही गलत नहीं,सब समय के अनुरूप है’ वो मुस्कराया।
मुझे उसकी बात थोड़ी जची ।अपने पे हँसी ।
अपनी कहीं बातों से हो गया दूध का दूध ,पानी का पानी।
माँ ने पूछा,जब कभी। कैसी हो?
जवाब होता बहुत अच्छी।
पिता पूछते कि कोई परेशानी?
मैंने कहा, ना
भाई ने पूछा,मेरी याद आयी ?
जवाब था, क्यों आएगी ?
बहन का कभी यह कह देना
हमारा साथ कैसा बढ़िया था।
मेरा जवाब होता, हाँ बढ़िया था,पर अब याद नहीं।
दोस्तों ने पूछा, हमारे साथ की गई मस्ती ।
पूरा दिन की धमाचौकड़ी जिससे हैरान थी बस्ती।
अरे!वो पागलपन के दिन ।
कौन याद रखेगा वो पलछिन ।
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इसी तरह ना जाने कितने झूठ बोलती हूँ।
फिर भी मुस्करा कर कहती हूँ कि मैं सच बोलती हूँ।
अभी भी मैं हूँ ,ज्यादा सच्ची पर थोड़ी सी झूठी।

अंतर्मन पर क्या ख़ूब लिखा है।
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हार्दिक आभार 🙏
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अंतर्मन को प्रभावित करती रचना है।
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हार्दिक आभार 🙏
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