श्रेष्ठ दिखने की चाह में सरलता खोती रही
सरलता के साथ ही,सत्यता भी धुँधलाती रही।
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इस प्रचलन पर सवाल सा उठता है बहुधा
श्रेष्ठता के बोझ तले मनुष्यता ही अब खो रही। अपर्णाशर्मा March 31st
आखिर
हर बार आवाज ने ओढ़ ली खामोशी की चादर
महत्वकांक्षा भी देता रहा संतोष को ही सत्कार।
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कुछ इस तरह जिंदगी में आता रहा ठहराव का अतिभार
आखिर,
ठहराव ने फिर चुना आवाज को ही हथियार।
अपर्णा शर्मा
March24th,2026
पहचान
कौन है आप?
शिशु के जन्म के पश्चात,शिशु को एक नाम से पुकारा जाता है. छोटा बालक उस नाम को ही अपनी पहचान मानता है और प्रत्येक कार्य को करने के बाद कहता है कि यह अमुक ने कार्य किया है. शनैः शनैः घर में उसे परिचित कराया जाता है कि अमुक नाम तुम्हारा है और वह उस नाम को स्वयं का परिचय समझ लेता है. उम्र में वृद्धि के साथ साथ, बालक अपने नाम के निमित्त कार्य कलाप करता है जिस से सर्वत्र उसके नाम को पहचाना जा सके और समाज में प्रशंसनीय एवं सम्माननीय व्यक्तित्व कहलाए.
जीवन के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर व्यक्ति को जब यह आभास होता है कि, क्या वह मात्र नाम ही है या कुछ और ?? तब वह वास्तविक पहचान हेतु चिंतन, मनन में लीन हो जाता है. अंत में उसे बोध होता है कि वह मात्र शरीर नहीं है बल्कि शरीर और आत्मा दोनों का मिलाजुला रूप है.अब तक जो भी उसकी पहचान है मात्र शरीर की जिसका नाम अमुक है.
तत्पश्चात,व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी अंतरात्मा की आवाज पर भी विचार करने लगता है. तब उसमे दैवीय गुण भी कार्य(परोपकार,सद्भावना,अहिंसा आदि) करने लगते हैं.इस प्रकार, एक व्यक्ति संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तित हो जाता है.
जब ऐसा व्यक्तित्व अपनी पूर्ण आयु कर इहलोक से परलोक को प्रस्थान करता है तब मात्र वह शरीर से ही प्रस्थान करता है जो कि नश्वर है परंतु अपने द्वारा किए गए नेक कार्यो से हमारे मध्य सदा ही विराजमान रहता है जो कि उसने अपनी आत्मा से अभिभूत हो कर किए थे.
सारांश यह कि व्यक्ति शरीर और आत्मा दोनों का मिलकर बना रूप हैं. आत्मा विचार को जन्म देती है और शरीर उसे कार्यान्वित करता है. शरीर की पूर्णता के पश्चात भी वह अपने कार्यो में सदैव जीवित रहता है क्योकि आत्मा अजर अमर है.
अपर्णा शर्मा Feb.17th,2026
