अंत में, अस्तित्व खो कर समन्दर हो गई
मीठी नदी,समंदर में मिल कर खारी हो गई
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चटकी तो होगी चाहत और डिगा होगा विश्वास भी
आखिर क्या थी मैं? जो प्रेम में अपना सत्व खो गई।
अपर्णा शर्मा
May 7th,24
परछाई
सूरज के चढ़ते ही वो मेरे संग संग हो लेती है
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जहाँ-जहाँ मैं चलूँ वो मेरे आगे पीछे ही रहती है।
अपर्णा शर्मा
April 9th,24
मायूस घर
किसने कहा, कि त्योहार केवल इंसान ही मनाते हैं
उनके संग संग घर के दर –ओ–दीवार भी मुस्कुराते हैं
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त्योहार गुजरते ही,जब इंसान निकल जाते है अपनी कर्मभूमि को
मायूस घर,दूसरे त्योहार के इंतजार में, वहीं खड़े रह जाते हैं ।
अपर्णा शर्मा
March26th,24
