धरती ने कुहासे का आवरण हटाकर देखा,अपने सम्मुख माघ को पाया
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धरा मुस्काई और प्रकृति ने कहा आह ! फिर बसंत आया।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th,24
खेल
मन के भाव,जब कलम लिख न सके
झूठ को लिखे और सच कह न सके।
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गुम हो भाव, दिशा,दशा और काल के भय से तब,सच झूठ के खेल में,इंसान जी न सके।
अपर्णा शर्मा
Jan.23rd,24
खाली हाथ
जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उसके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा।
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जब छुटा कोई, लगा, खाली हाथ ही रहा
यूँ जिंदगी भर ऐसे ही हाथ मलता रहा।
अपर्णा शर्मा
Jan.16th,24
