एक सुनहरी पगडंडी पर
निकला था वो सकुचा कर
ख़्वाब बसे थे उस रस्ते
चलता था वो इतरा कर।
धीरे-धीरे ख्वाबों के भी
उपजे थे उसमें अंकुर भी
ख्वाबों की नाजुक कोंपल सी
बसी थी दुनिया अंतरंगी सी।
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डगमग डगमग चलता जाता
ख़्वाब वनों का बसता जाता
कभी बसंत सा, कभी हेमंत सा
उसका ख़्वाब निखरता जाता।
घने ख़्वाब के जंगल में
खोया था अपनी ही धुन में
तभी जेहन में बिजली कौंधी
बहुत दूर था अपनों से।
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हर ख़्वाब पर फूल खिले थे
फूलों की खुशबू से महके थे
कीमत उसने बड़ी चुकाई
सारे ख़्वाब सच करने में।
अपर्णा शर्मा
March13th, 2026
रंगों के मौसम में
रंगों के इस मौसम में
अब रंग फीके से लगते हैं
फूलों के इस मौसम में
फूल भी कागज़ के दिखते हैं।
प्रेम रंग में डूबे इंसा
मुश्किल से ही दिखते है।
मानवता की बातें करने वाले
नफरत में डूबे रहते हैं।
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कच्चे रंगों के बाजारों में
पक्के रंग खो जाते हैं
रंगों पर दूजे रंग चढ़ते ही
पहले रंग धुंधले हो जाते हैं।
रंगों की बौछारों में भी
मन रीते ही रह जाते है
मन को उल्लासित कर दे
वो रंग बाजारों में न मिलते हैं।
अपर्णा शर्मा
March 6th,2026
फिर तेरी कहानी याद आई
हिमशिला सी ठहरी यादें
सर्द हवा में सिकुड़ी यादें
बसंती हवा के बहते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
पतझड़ सी शुष्क थी जो यादें
इधर-उधर को छितरी वो यादें
नव कोंपल के खिलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
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भावों में डूबी गहरी यादें
शब्दों को खोजती यादें
भावों के शब्दों में ढलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
कोहरे की सुबह सी यादें
धुंधली सी दिखती थी यादें
माघी सूरज के चमकते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
अपर्णा शर्मा
Feb.27th,2026
