बता! जिंदगी तू और बता

पतझड़ सा तू खूब सताती रही
कभी सदाबहार सी खिलती रही।


बसंत की मीठी सुगंध महक रही
कभी पतझड़ की उदासी छाई रही
तेरे इन अंदाज पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू शरारतें कर शोखियाँ दिखाती रही
कभी बुलबुला बन कर बिखरती रही।

ठोकरों में तू हमेशा संभालती रही
कभी मंजिल देकर, तू छीनती रही
तेरे इस व्यापार पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू अपने इशारों पर नचाती रही
रुला कर भी,कभी हँसाती रही।

प्यार के पलों की उम्र कम ही रही
यादों के संग तू खूब जीती रही
तेरे इस नखरे पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
अपर्णा शर्मा
Feb.20th, 2026

आ अब लौट चले

जब चला था अनजानी राहों में
सपनों भरी मंजिल की बाहों में
थक कर, जब भी लगा सुस्ताने
मन बोला, आ अब लौट चले।
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कर के अथक प्रयासों को
पाकर सुखद परिणामों को
जब  था हल्का सा मुस्काया
मन बोला, आ अब लौट चले।

काँटों पर चलते इस जीवन में
अंगारों से जलते इस जीवन में
जब भी शीतल बयार बही
मन बोला, आ अब लौट चले।
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इक दिन मैंने मन को ही सुना
सच में उस आँगन लौट चला
जाकर वहाँ सबसे अनजान हुआ
मन फिर बोला, आ अपनी मंजिल लौट चले।
अपर्णा शर्मा
Feb.13th,26

आईने में हो तुम

कभी तुम्हीं आईना थे
अब आईने में हो तुम
संवारता रहा मुझे आईना
उसमें दिखते रहे हो तुम।
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नयनों में गहराता काजल
यादों का लहराता बादल
सुर्ख होते गालों की लाली
आईना कहे सारी हालत।

केशविन्यास करुँ तब ये अलकें
न सुलझे,न संवरे ये काली जुल्फें
तेरी धुन पर करती ता ता थईया
आईने में ये अदा खूब ही झलके।
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प्रेयसी का बस एक निवेदन
सारे श्रृंगार तुझको ही अर्पण
आ जाओ,कहती ये धड़कन
शायद बोल उठे आज ये दर्पण।
अपर्णा शर्मा
Feb.6th, 2026

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