चारों ओर से धरा को घेरा
उमड़-घुमड़ जब आए मेघा
तेज हवा में,सब थर-थर कांपे
मार के फेरा, वो गए मेघा।
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रोज-रोज, अब खूब छकावे
गरज-गरज के,क्रोध दिखावे
कार्यों में,रोज विलंब करा कर
उड़-उड़ जावें, काले मेघा।
चतुर्मास के कोतवाल हुए
मनमर्जी से, मेहरबान हुए
कहीं सूखा, कहीं बना सैलाब
आगत का फल, लिख रहे मेघा।
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कहीं-कहीं खूब प्रेम उड़ेले
सागर में बदले,नदी,नाले
उफान मचाकर धरती पर
फिर कुछ न सोचें ये मेघा।
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‘हरेला’ की नव पौध पुकारे
धरती अंदर,नन्हा बीज़ पुकारे
त्राहि-त्राहि मचे, बिन मेघ के
बरस-बरस धरती नम करते मेघा।
(हरेला- उत्तराखंड का पर्व )
अपर्णा शर्मा
July11th,25
बोझ
हल्के ,फुल्के, भरे गुब्बारे से
जो जीवन रंगते, मधुर सपने।
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जाने कैसे, काँधे पे आ बैठे
बोझ सरीखा,अब खींच रहे।
अपर्णा शर्मा
July8th,25
वो बरसाती शाम
याद है न,वो बरसाती शाम
किए थे,जब बहुत तामझाम
जल्दी निकला था मैं उस दिन
छोड़ कर अपने सारे काम.
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काली घटा सुबह से छाई थी
हवा चली थी मद मस्त चाल
शाम के पहले निकला ही था
कि मौसम ने बदली अपनी ताल.
घनघोर बादल और अंधियारी
चौराहे पर थी चुप्पी अति भारी
इक बच्ची, वहॉं गुब्बारों के संग
बेच रही थी, संग अपनी लाचारी.
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जाने क्यूँ मैं चल न सका था
जड़ सा बिल्कुल वहाँ खड़ा था
तुम उकता कर चले गई थी
मैं सब गुब्बारे खरीद रहा था.
तुम संग चाय और मैं का होना
जैसे सदियाँ पल में हो जीना
पर बच्ची की एक वो मुस्कान
जैसे सुकून का प्याला हो पीना.
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जब जब आती ये बरसाती शाम
यादों की बरसातें लाती ये शाम
तुम्हारा बस ‘मैं’ में ही रह जाना
मुझे ‘मुझसे’ मिलवा गई वो शाम
अपर्णा शर्मा
July4th,25
