हाथ नेह के

ये हाथ बढ़े हैं अनुराग से भरे हृदय के
ये हाथ बढ़े हैं स्नेह में डूबे नयनों के
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ये हाथ बढ़े हैं मेरे विश्वास से भरे नेह के
थाम  भी लो,न मुस्कराओ अब तुम दूर से।
अपर्णा शर्मा
July22nd,25

कुछ दर्द कभी नहीं मरते

चाहे अश्रु नयनों में हो सूखे
अंतर्मन के अन्तर भी हो सीले
चाहे शक्ति हो, दर्द सहने की
पर कुछ दर्द कभी नहीं मरते।
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मन में,दबा-छुपा कर रखे दर्द
जब तब बाहर झांका करते
कितना भी रोको,थामो इनको
पर कुछ दर्द कभी नहीं मरते।

पुरवा में जैसे हो सिहरे-सिहरे
घाव गहराते फिर से हरे-हरे
नियत तारीखों पर जीते हैं दर्द
कुछ ऐसे दर्द कभी नहीं मरते।
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अपनों के दूर चले जाने से 
जो आघात दिलों को दे जाते
हर दिन आते वो सपनों में अब
टूटे सपनों से अब हम डरते।
कुछ ऐसे दर्द कभी नहीं मरते।
अपर्णा शर्मा
July18th,25

कुतुबखाना

कुछ किताबें, जो समझ में न आई थी उन्हें सहेजते रहे
कुछ किताबें, जो पसंद आई, उन्हें यूहीं जमा करते रहे।
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ऐसे ही कुछ किताबे है ,जो यदा कदा मिलती रही तोहफे में
इस लत-ए-जमा को, कमाल-ए कुतुब खाना कह रहे। (*कुतुबखाना- library )
अपर्णा शर्मा
July 15th, 25

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