हिमशिला सी ठहरी यादें
सर्द हवा में सिकुड़ी यादें
बसंती हवा के बहते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
पतझड़ सी शुष्क थी जो यादें
इधर-उधर को छितरी वो यादें
नव कोंपल के खिलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
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भावों में डूबी गहरी यादें
शब्दों को खोजती यादें
भावों के शब्दों में ढलते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
कोहरे की सुबह सी यादें
धुंधली सी दिखती थी यादें
माघी सूरज के चमकते ही
फिर तेरी कहानी याद आई।
अपर्णा शर्मा
Feb.27th,2026
दो पंक्ति
कर्मों को दुत्कार कर
चाहता रहा अधिकार
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जबकि काबिल को भी
मिलता रहा तिरस्कार।
अपर्णा शर्मा
Feb.24th,26
बता! जिंदगी तू और बता
पतझड़ सा तू खूब सताती रही
कभी सदाबहार सी खिलती रही।
बसंत की मीठी सुगंध महक रही
कभी पतझड़ की उदासी छाई रही
तेरे इन अंदाज पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू शरारतें कर शोखियाँ दिखाती रही
कभी बुलबुला बन कर बिखरती रही।
ठोकरों में तू हमेशा संभालती रही
कभी मंजिल देकर, तू छीनती रही
तेरे इस व्यापार पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
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तू अपने इशारों पर नचाती रही
रुला कर भी,कभी हँसाती रही।
प्यार के पलों की उम्र कम ही रही
यादों के संग तू खूब जीती रही
तेरे इस नखरे पर मैं कहती रही
बता!जिंदगी तू और बता।
अपर्णा शर्मा
Feb.20th, 2026
