अजीब सी कशमकश में जी रहे हैं वो
हर नज़र को नज़रअंदाज कर रहे हैं वो।
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जो कभी देखते ही,एक दूसरे को गले लगते थे
मन से कोमल पर,बाहर से सख्त हो रहे हैं वो।
अपर्णा शर्मा jan.20th,2026
अजीब सी कशमकश में जी रहे हैं वो
हर नज़र को नज़रअंदाज कर रहे हैं वो।
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जो कभी देखते ही,एक दूसरे को गले लगते थे
मन से कोमल पर,बाहर से सख्त हो रहे हैं वो।
अपर्णा शर्मा jan.20th,2026
सुनो! प्रकृति
बिसरती नदियां
बिखरती प्रलय।
फैलती सड़के
सिमटते अरण्य।
बढ़ते पर्यटक
घटता हिमालय।
अब इसकी सजा क्या दोगे?
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सुनो! समाज
सिकुड़ते घर
बढ़ते खर्च।
घटते विद्यालय
बढ़ते कुतर्क।
घटते उत्सव
बढ़ते अपकर्ष।
अब इसकी सजा क्या दोगे?
अपर्णा शर्मा
Jan.16th,26
पुष्प, शाख,पात सभी सर्द से जड़ हुए शिशिर में
फिर खिलेंगे, महक ही पहचान बनेगी बसंत में।
हिम हुआ हिमालय,आदित्य के वियोग में
फिर प्रवाह बढ़ेगा, प्रकाश की वृद्धि में ।
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जुदा हो गया दोस्त, जो बसा था उसके जिगर में
पर दोस्ती आज भी जिंदा है,उसकी हर फ़िकर में।
समय के सैलाब में खो दिया, उसने अपने महबूब को
मोहब्बत पर नाज़ कर, मानता है वो हर उसूल को।
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कभी-कभी बदल जाते हैं, व्यवहार रिश्तों में
नहीं बदलता पर, मूल भाव किसी रिश्ते में।
अपर्णा शर्मा
Jan.9th,2026