दो पंक्ति

जिद, वहीं अड़ी रही और उसी जगह पर खड़ी रही।
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आदतें लड़ी नहीं, बदलती रही और आगे बढ़ती रही।
अपर्णा शर्मा
March10th,26

दो पंक्ति

अंगारों पर बैठी दुनिया,एक दूजे को कमतर आंक रही।
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क्रूर होती दुनिया,अब मानवता को धिक्कार रही।
अपर्णा शर्मा
March 3rd,2026

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