Women’s day



हे नारी ,आश्रितों सा जीवन त्यागो
जागो,उठो,आलम्बन को गले लगाओ ।
पतझड़ से वीराने,शुष्क जीवन में,
अर्थ,लाभ के पुष्पों सा बसंत महकाओ ।

पढ़ लिख कर,घर खूब संवारा तुमने,
अब सुन्दर समाज संवार,सजाओं ।
उठो! हे परिवार की सुघड़ नारी,
सब को स्व-आलम्बन का अर्थ बताओ ।
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परिवार को,संस्कारों की,पोथी पढ़ा
सत्य से भरा,उन्नति पथ दिखाया है ।
जागो!हे परिवार की योग्य नारी,
अब अर्थ का मार्ग भी दिख लाओ ।

सुघड़,संस्कारी,योग्य हर गुण तुम में
अब शर्म में ,न समय तुम गवांओ ।
उठो! हे भारत की सबल, कर्मठ नारी,
अब यह सदी तुम अपने नाम करो ।

मन का फेरा

गाँव बसा है तन मन में
हर दम संग में जीता है
शुरुआत में पढ़ा गॉव से
माँ का आँचल भी गीला है
यही तो मन का फेरा है।

शहर में जब से आया
सपनों का पीछा करता है
अपनों के संग रहना चाहा
तो सपनों से नाता टूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।


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पढ़-लिख,नाम करा बाबा का
बाबा से भी नाता टूटा है
देश-विदेश खूब नाम कमाया
शहर तो अपना छूटा है
यहीं तो मन का फेरा है।

इतना सब कुछ पाया कमाया
कहीं न रच बस पाया है
सेवानिवृत हो,सब छोड़–छाड़ के
घर को वापिस आया है
यहीं तो मन का फेरा है।


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सुबह खेत,शाम हाट करे है
सारे संगी घर को आए हैं
बचपन को भरपूर जिए है
फिर से समय फिराया है
यहीं तो मन का फेरा है।

नूतन प्रेम

मैंने यहाँ वहाँ संपूर्ण संसार में 
जीवन खो दिया उसकी खोज  में ।
आजकल कोई  उसे  जानता नहीं
उसे  व उसके स्पर्श पहचानता नहीं ।
अधिकांशतः
वह मिल जाता है,कभी राह  में
ऐसा होता  है सिर्फ़  स्वप्न   में ।
स्वार्थ  की  दुर्गन्ध  से लिप्त
खो गया किसी चौराहे  पर ।

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एक दिन
सिसकियाँ, कराहना सुना मैंने
लावारिस  पड़ा घाव देखता वह ।
मुझे बेबसी से उसने देखा
कहा ,
मुझे ही तुम खोजते हो ।
मैं ही प्रेम हूँ,
लावारिस हूँ।।
दिखावे के लिए मुझे सब अपनाते है
और स्वार्थ में अंधे हो
यहाँ  छोड़ जाते है।

अपर्णा शर्मा Feb. 21st,25 (पुनः प्रकाशित)

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