कभी संकरी, कभी सर्प सी रेंगती
दिखती रेतीली, बहुत ही पथरीली।
सूर्य का ताप जैसे अलंकृत हो रहा सोना
लीन न हो, आस का संकरा प्रवाह ।
कभी उफनती, सर्वस्व निगलती
भय युक्त कर, गाँव-गाँव समाती।
सब तटबंध तोड़, लील लेगा सैलाब
मानो आया प्रलय का अंतिम पड़ाव ।
कभी अत्यंत मौन, पेड़ों की हवा, छाँव
कल-कल करती सुख का अद्भुत राग ।
असीम शांति, यही है, हाँ! यही मेरी चाह
अनंत रंगों से सजे हैं, आज धरती आसमाँ ।
सुबह शाम, शांत, घंटियों का अनहद
पक्षियों के नाद से गुंजित उन्मत्त मन ।
कभी पुष्प सी समर्पित है मेरी बंदगी
इस नदी के रूप सी है, मेरी ज़िंदगी ।(अपर्णा शर्मा)
