वो सफर पर अकेला था
वो वहीं पर अकेली खड़ी
बस यह वज़ह रही जीने की
वो थी प्रेम की सुनहरी लड़ी.
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वक़्त के बीतते-बीतते
दोनों बढ़ चले अपने रास्ते
पर आज भी वज़ह है वहीं
दोनों के प्रेम की सुनहरी लड़ी.
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न मिलने की अभिलाषा
न विरह का कराहना
मौन जीवन में वज़ह वहीं
दोनों के प्रेम की सुनहरी लड़ी.
अपर्णा शर्मा
June 26th,2026
दो पंक्ति
नफा, नुकसान से अलहदा
धीमे से दस्तक दे गई वफ़ा।
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हो गई , बस अब हो ही गई
अब इसका क्या फलसफा।
अपर्णा शर्मा
June 23rd,2026
इश्क
वो ढूंढता रहा इश्क
हो कर दर ब दर
मिलता रहा प्रेम
स्वार्थ में लिपट कर।
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कभी जरुरत तक
कभी छले जाने तक
और कभी इश्क उतरा
जान कर असलियत।
कभी सरलता के आवरण में
कभी सरसता के लावण्य में
ठगता रहा हर कदम इश्क
मासूम दिलों को बहला कर।
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काश किसी को ग़र इश्क मिले
इत्तला जरुर हो उस मासूम को
जो आज भी बदहवास सा हुआ
दर ब दर ढूंढ रहा इश्क को।
अपर्णा शर्मा
June19th,2026
