ख़त



आज,अलमारी जब साफ़ करने लगी
कोने में छुपी संदूकची,मुझे बुलाने लगी।

ठिठकी सी मैं भी,लालच में उसे तक रही
लालच दिखा,वो मुझ पर जोर से हंस रही।
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झट से संदूकची खींची,खोल कर यादें समेट ली
नज़रे बचा,चुपके से खतों की मैंने कोली भर ली।

संदेशों से भरे पत्र आज भी करीब कर देते हैं रिश्ते
ख़त में सहेजे भाव,जैसे एहसास ए समन्दर की लहरे।

कुछ घर के,मित्रों के,नौकरी का नियुक्ति पत्र भी इस ख़ज़ाने में
हर बार,अलग संदेश होता है प्रिय के दो पंक्ति के पत्र में।
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पीले कार्ड,अंतर्देशीय,कुछ लंबे से पत्र मित्रों के
जिनमे,जिक्र हैं काम के और कुछ लफ्फाजी के।

ख़त ले गए आज,बीते समय के हल्के फुल्के से दिनों में
चेहरे पर छा गया नूर,छिप गया था, जो कुछ दिनों से।
स्वरचित:
अपर्णा शर्मा
June 9th, 23

सांसों का ताना बाना

जीवन के खुले मैदान में
सांसो का अजब सा खेला है।
जिसने सांसो को बाँध लिया
उसने ही खेल को जीता है।
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आती जाती इन सांसो में ही
जीवन का मधुर संगीत बसा.
जिसकी सांसे साथ छोड़ चली
उस घर फिर उल्लास कहाँ दिखा?

सांसों की कीमत वो जाने
जिनके अपने बिछुड़ गए।
अपनी सांसे हरपल बोझ लगे
बिछड़े की साँस पर विचार करे।
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जीवन है धागे सा
जो तकली सा नाच नचाए।
सांस के तानेबाने से
जीवन हरपल बुनता जाए।
स्वरचित:
अपर्णा शर्मा
2nd June 23

विनम्रता झुकना सिखाती है।

शैशवावस्था में रोपित गुण का बीज़
अनुकूलन मिलते ही होता अवश्य अंकुरित
समय और मौसम के ये सभी परिवर्तन
निश्चित काल समय में होते निश्चित पल्लवित।
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ऐसे ही विनम्रता सद्गुण वृक्ष का बीज़ आधार
अवगुणों से सदा दूर करें जो बारम्बार
विनम्र वृक्ष का झुकना ही रहा सदा परिणाम
अहंकार छोड़,सब समान है की करता मनुहार।

विनम्रता का परिवर्तन बनता जाता वट समान
हर इच्छित को मिलता विकलता से तुरत निर्वाण
झुकना स्वभाव में जब आता,आते गुण निकट
गुणी को सर्वगुणी बना हरता सभी कपट।
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विनम्रता सदा रहा मानव का श्रेष्ठ गुण
संदेह नहीं, दूर करे ये सारे ही अवगुण
अति झुको पर,इतना सा सदा रहे विचार
याचक से दृष्टित न हो विनम्रता के आचार।
अपर्णा शर्मा
26 May 23

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