गुरु

संस्कार के वाहक सदा रहे हैं कुटुंब
और गुरुओं ने दी जीवन की पहचान
सम्पूर्ण ज्ञान पुस्तक में ही रह जाता
गर गुरु न कराते हमें इसका भान।
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शिशु रुप में जन्म लेकर बालक
शिशु बुद्धि से पूरा कर जाता जीवन
नहीं सीख पाता वो सांसारिकता
गर गुरु न बनाते शिशुओ को इंसान।

विद्या से ही पाते बालक ज्ञानार्जन
और संग में करते चरित्र निर्माण
सही गुरु के सानिध्य से ही बालक पाते
धनोपार्जन का, इस जग में, अनुपम सम्मान।
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शिक्षा में घुमक्कड़ी भी होता है एक प्रकार
देश विदेश का ज्ञान कराए बिना किसी तकरार
समूह में कार्य करना सीख जाते ऐसे ही बालक
और पाते एतिहासिक और भौगोलिक ज्ञान का भंडार।
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गुरु का बखान शब्दों में कभी नहीं हो सकता
समाज और संस्कृति से शिक्षक का महत्व झलकता
यदि हमारे जीवन में निस्वार्थी गुरुजन न होते
जीवन शायद सभी का कोरा कागज ही रह जाता।
अपर्णा शर्मा
Sept.6th, 23

सितारें*

सितारों के आगमन से रात की चूनर सज गई
इस चूनर को ओढ़ते ही अवनी थकान भूल गई।

दिनभर के कोलाहल शांत हो, कोने में सिमट गए
पंछी सभी अपने घोंसलो में जा कर सो गए।

बछड़े घेर में,गैया को याद कर, रम्भा रहे
बालक भी माँ के अंक में छुप कर सुकून पा रहे।

सितारे की इस चमक को चाँद करीब से निहार रहा
और सितारा,रात के राही को,दूर से ही दिशा दिखा रहा।
अपर्णा शर्मा
Sep.1st,23

पहली दस्तक



हमदम,हरदिल,अजीज सूरज सा
गहराता जीवन में घुलता रात्री सा
चाँद की चाँदनी सा हुआ अलंकृत
स्वार्थ से परे अनवरत ऐसा एक रिश्ता।

मौसम का ना होता कोई असर
ऋतु से अनजान सबसे बेख़बर
हर पल का साथ जैसे खिले बसंत
एक दूजे के सदा ही बनते रहबर।
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किसी एक की यक सी अनुपस्थिति
समझ न आती दूजे को ये परिस्थिति
आवारा बादल यहाँ वहाँ विचरता
खुद से बदली बदली लगे अपनी ही मनःस्थिति।

यह विछोह अंतर्मन को झकझोरे
देख सखा को हृदय में उठे हिलोरे
तन मन में शीतलता का ज्वार उठा
जैसे शांत से समंदर में लहरों की मौजे।
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शुक्र है जो जीवन में विरह आता
इंतजार ही इश्क की पहचान कराता
जब एक एक पल सदी सा दीर्घ हो जाए
उसी क्षण, पहली दस्तक इश्क दे जाता।
अपर्णा शर्मा
August 25th, 23

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