गिरते-उठते, चलना सिखा गई जिंदगी
चलते-चलते रास्ते सूझा गई जिंदगी
जिंदगी में रास्ते तराशने की जुगत में
जिंदगी को बेहतर जीना सिखा गई जिंदगी।
https://ae-pal.com/
सदा ही दो किनारों संग चली ये जिंदगी
जैसे कहानी में चलती है बात सच्ची और झूठी.
अंत तक नहीं पता,क्या सीखा रही बेरहम
हरा गई या जीता गई बहुरूपिया सी जिंदगी ।
अंत में, समझ इतना ही आया बस मुझे
हार और जीत संग-संग दिला गई मुझे
जब मंजिल मिली तो हार गया था सफर
सफर को हरा,मंजिल दिला गई जिंदगी।
https://ae-pal.com/
शिक्षा में जीता तो बचपन हार आया था
श्रेष्ठ जीवन हेतु,गाँव,संगी,सभी गवाया था
इस तरह शतरंज सी जिंदगी की हरेक शै याद आई
हार पर रोया, कभी जीत पर आँख भर आई।
अपर्णा शर्मा
Sept.15th,23
मनहर हिंदी
कंठहार सी मनहर हिंदी
भारत की पहचान है।
हर राज्य की भाषा से भी
न हिंदी अनजान है।
https://ae-pal.com/
बेशकीमती नगीने जैसी चमक
रही,हर क्षेत्र की भाषा है।
इनको एक सूत्र में हार बनाती
अपनी हिंदी भाषा है।
समाज में बोली जाती विभिन्न
प्रकार की भाषा।
देश प्रेम से ओतप्रोत कर देती
प्यारी हिंदी भाषा।
https://ae-pal.com/
औपचारिक भेंट में बोली जाती
अब अंग्रेजी भाषा।
सादा,सरल मिलन में खूब नेह
बरसाती हिन्दी भाषा।
अपर्णा शर्मा
Sept.14th ,23
(हिन्दी दिवस पर विशेष)
नटखट बचपन
प्रत्येक बालक राम,कृष्ण सा
जिए बालपन को बेफिक्र सा
नटखट बचपन खूब रिझाए
घर-आंगन में जब घूमे कृष्णा।
हर बाल गोपाल की लीला होती न्यारी
एक बालक ने अंगुठी बोदी जो थी क्यारी
रोज उसमें पानी देकर खूब निहारता
सोचता पेड़ उगेगा,अंगुठी लगेगी प्यारी प्यारी।
https://ae-pal.com/
एक दिन पिताजी ने एलान किया
सामान बाँधों, तबादला हुआ
सब अपना सामान लगे बाँधने
पर गोपाल हैरान परेशान हुआ।
जो अंगुठी बोई थी क्यारी में उसने
पेड़ नहीं निकला था अभी तक उसमें
फिर बातचीत से पता लगा था उसको
बीज़ दुबारा बो सकते हैं कहीं और पे।
https://ae-pal.com/
सब अपना सामान बाँधने में थे व्यस्त
भोला गोपाल क्यारी खोदने में हुआ पस्त
पर यह क्या हुआ, ना पेड़, ना बीज़ मिला
आया नए शहर में, मन था अस्त व्यस्त।
एक दिन उसने पिता को अपना हाल सुनाया
पिताजी ने फिर उसको बागवानी का गुण सिखाया
धीरे-धीरे वह सब भूल कर,बढ़ गया आगे
नटखट बचपन याद कर,आज फिर मुस्कुराया।
अपर्णा शर्मा
Sept.8th,23
