हिम्मत न हारना

मनुष्य जीवन पाया है तो मुश्किलों का आगमन लगा रहेगा
पर हर मुश्किल को पछाड़ मनुष्य कभी भी हिम्मत न हारना।

पहाड़ जैसे दुःख से जब जीवन लगे डरावना
पहाड़ से जैसे ही अडिग होकर हर कष्ट को हराना।
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जब कभी जीवन में दिशाहीन सा उदेश्य हो जाए
नदी के जैसे आगे बढ़ कर समुद सा लक्ष्य पा जाना।

पतझड़ सा उदासी भरा मन जब जीवन निर्जनता दे जाए
तब नई कोपलों का इंतजार वृक्षो सा,मानव तुम करना।
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कड़वाहट सी इस दुनिया में जब रिश्ते खारे हो जाए
रिश्तो को अपने में समा कर समुद्र सा खारापन पी जाना

तेज धूप सा जीवन में जब मान से तुमको सम्मान मिले
तब परछाई की भाँति तुम जमीन से जुड़ कर जी जाना।
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इस सबसे यहीं है जाना, प्रकृति के नजदीक तू हरदम रहना
फिर कैसा भी समय आए जीवन में, तू कभी न हिम्मत हारना।
अपर्णा शर्मा
May17th,24

बस अब और नहीं

कभी दूर-दूर तलक फैली हरियाली
अब कहीं दूर तलक दिखती नहीं
प्यासी धरती,भूखे,तड़पते निरीह जीव 
जंगल बोले,मेरा दोहन बस अब और नहीं।

कल कल करती बहती थी जो नदियां
कंकर पत्थर से भरी लगती है पगडण्डियाँ
बूंदे,बारिश,बादल ये सब स्वप्न से हुए
प्रदूषित नदियां यही कहे,बस अब और नहीं.

सुखदायी शब्दों की बरसातें
लगती जैसे अनमोल सौगातें
शांत मन से सही को पहचानो
अंतर्मन की आवाज,बस अब और नहीं।

कल,और भी सुंदर कल में उलझा आज
उज्ज्वल आगत में डूबा हर सपने का साज
हरा-भरा वर्तमान दूर तलक दिखता नहीं
अब भविष्य कह रहा,बस अब और नहीं
अपर्णा शर्मा
May10th,24

पलाश

पहाड़ों के आगोश में
दिलों के दबे अरमान से.
जब खिलते हैं पलाश
मचलती है फिर तलाश।
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जो बिछुड़ गया पत्र सा
पतझड़ के वियोग सा
खिला गया फिर बसंत
आ गया फिर सैलाब सा।

शंख सा शुभ आकार लिए
वनों में,दिलों में आग लिए
नदी सी निरव जिंदगी में
फिर वहीं अरमान सुलग गए।
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तेरे आगमन के अनंत होते इंतजार में
एक पुष्प और जुड़ा उस तेरे पुष्प हार में
जिस बरस ना खिलेगा जब ये पलाश
आखिरी बरस होगा शायद तेरे इंतजार में।
अपर्णा शर्मा
May 3rd,24

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