अगर मगर

पुरानी होती डायरी के पीले होते पन्नों में
न जाने कितने अलसाए ‘अगर’ ‘मगर’ है बिखरे
आज भी कुछ ‘अगर’, काश की चाशनी में हैं लबालब
वहीं कुछ ‘मगर’ डायरी की दहलीज पर खड़े ठिठके से।
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कहीं किसी पन्ने पर,’किंतु’ यक्ष सवाल सा डटा
और कहीं ‘परंतु’, जवाब देकर लाजवाब सा दिखा
समय ने दफन कर दिए थे जो अपने से “किंतु,परंतु’
आज बेलौस सा मैं,उनकी ताकतें तौलता दिखा।

डायरी की ज़िल्द में सिल दिए थे जो ‘ये’ और ‘वो’
सब उधड़ कर,छितर कर, ताकतें हैं इस कदर वो
बे-आस सा मापता हूँ अब उन परों के हौसले
मलाल लिए कि,न ‘ये’ हो सका, न कर सके ‘वो’।
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अगरबत्ती के कवर से खुशबु महकाई थी डायरी में
सफेद पन्नों को विरासत बना दिया है काली स्याही ने
पन्नों में धमाचौकड़ी मची है ये वो,किंतु परंतु,अगर मगर की
दिमाग में उमड़ते शब्दों को, रंग जो दिया है स्याही ने।
अपर्णा शर्मा
May24th,24

हिम्मत न हारना

मनुष्य जीवन पाया है तो मुश्किलों का आगमन लगा रहेगा
पर हर मुश्किल को पछाड़ मनुष्य कभी भी हिम्मत न हारना।

पहाड़ जैसे दुःख से जब जीवन लगे डरावना
पहाड़ से जैसे ही अडिग होकर हर कष्ट को हराना।
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जब कभी जीवन में दिशाहीन सा उदेश्य हो जाए
नदी के जैसे आगे बढ़ कर समुद सा लक्ष्य पा जाना।

पतझड़ सा उदासी भरा मन जब जीवन निर्जनता दे जाए
तब नई कोपलों का इंतजार वृक्षो सा,मानव तुम करना।
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कड़वाहट सी इस दुनिया में जब रिश्ते खारे हो जाए
रिश्तो को अपने में समा कर समुद्र सा खारापन पी जाना

तेज धूप सा जीवन में जब मान से तुमको सम्मान मिले
तब परछाई की भाँति तुम जमीन से जुड़ कर जी जाना।
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इस सबसे यहीं है जाना, प्रकृति के नजदीक तू हरदम रहना
फिर कैसा भी समय आए जीवन में, तू कभी न हिम्मत हारना।
अपर्णा शर्मा
May17th,24

बस अब और नहीं

कभी दूर-दूर तलक फैली हरियाली
अब कहीं दूर तलक दिखती नहीं
प्यासी धरती,भूखे,तड़पते निरीह जीव 
जंगल बोले,मेरा दोहन बस अब और नहीं।

कल कल करती बहती थी जो नदियां
कंकर पत्थर से भरी लगती है पगडण्डियाँ
बूंदे,बारिश,बादल ये सब स्वप्न से हुए
प्रदूषित नदियां यही कहे,बस अब और नहीं.

सुखदायी शब्दों की बरसातें
लगती जैसे अनमोल सौगातें
शांत मन से सही को पहचानो
अंतर्मन की आवाज,बस अब और नहीं।

कल,और भी सुंदर कल में उलझा आज
उज्ज्वल आगत में डूबा हर सपने का साज
हरा-भरा वर्तमान दूर तलक दिखता नहीं
अब भविष्य कह रहा,बस अब और नहीं
अपर्णा शर्मा
May10th,24

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