पतझड़

स्वागत नव कोपलों का
मौसम पुष्प पल्लवों का
शुष्क हवाओ में झूमते
मदमस्त झोंका बयार का।
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शीत तरंगो में झूमते लहरते
मौन ठाने, माघ को ताकतें
अधीर इंतजार बहार का
विदाई प्राणप्रिय पत्रों की झेलते।

विजय होकर प्रचंड शीत से
गर्वित हो,गाते गीत प्रीत के
अल्हड़ गोधूम मौज में झूमता
ढलती शिशिर के प्रकोप से।

ऋतु बसंत,राजा कहलाता ऋतुओं में
मधुरस में मतवाला माघ फागुन झूमे बेसुधी में
टेसु,गेंदा,गुलाब गुलाल से फैले वसुधा में
उल्लास नया भरते सबके बैरी पतझड़ में।
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कई पतझड़ झेले,दूर खड़ा ठूंठ वृक्ष
अपनी नव पौध में देखता अपना अक़्स
सोच रहा हर बार पतझड़, बसंत नहीं लाता
चिर पतझड़ ओढ़े झांक रहा अपना अंतस।
अपर्णा शर्मा
March15th,24

*गोधूम-गेहूँ

नारी है वो

घर का दमकता सूरज नहीं,झिलमिलाती रोशनी है घर की
चिड़ियों की चहचहाट तो नहीं ,रंग बिखेरती तितली है वो।

मौसम,बेमौसम उमड़ते-घुमड़ते है बादल, गगन में
पर रिमझिम फुहार सी, हर वक़्त,बरसती है वो।
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हर खुशी को चार चांद लगाती, अपनी खिलखिलाहट से
कभी निराश मन को, नकली मुस्कान से, समझाती है वो।

अपनी लटों को संवार ,हर समाधान खोजना
और झटक कर ,कठोर निर्णय भी लेती है वो।
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छोटी से छोटी बात और काम पर, निर्भरता उसी पर
अधिकतर बड़ी बातों में, देनदारी सिफर रखती है वो।

हर दिन अपने प्रियजनों पर,अपने को करती समर्पित
प्रतिवर्ष ‘स्त्री दिवस’ पर, स्व मूल्यांकन करती है वो।
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शिव की साधना में, जैसे शक्ति का है समावेश
ऐसे ,हर उम्र में ,खुशबु सी, महकती है वो।

जिंदगी के हर चरण को, उत्सव सा मनाती
फिर भी रीतेपन को ढोए, ऐसी नारी है वो।
अपर्णा शर्मा
March8th,24

झरोखा

दो भिन्न भिन्न सी जिंदगी को,
रीति रिवाजों की दुनिया को
विभिन्नता का साक्षी बना,
सहेजता मानो, संस्कृति  को।
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हवेली,रजवाड़ों में उत्सुकता को बढ़ाता
राजसी ठाठ-बाट की कहानियां सुनाता
रहस्य और आश्चर्य से भरी उस दुनिया में
आमजन तक विशेषजन का जीवन ले आता।

परंपरा की मखमली चादर से लिपटा हुआ
बंदिशों के चमकते, चुभते तारों से कसीदा हुआ
प्रजा को ललचाता ये हवेली का झरोखा
है आह और बेबसी की मिसाल  ए बददुआ।
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कभी जब झरोखा खुलता है बाहर को
खुली वायु का रसास्वादन कराता बाला को
उसे भी दूसरी दुनिया टेर लगाती प्यार से
ये झरोखा बाँटता आया है आम और खास को।
अपर्णा शर्मा
Mar.1st,24

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