खाली हाथ*

जीवन में एक से बढ़कर एक मिलता रहा
उनके बिना जीना नामुमकिन सा लगता रहा.

जीवन में रच बस कर ,जीवन का सुकून से लगे
सोचता,कुछ ना छूटे,सब यूहीं मिलता रहे.
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हर वस्तु,मित्र,रिश्ते और शहर भी रूह से जुड़े रहे
इनके बिना जीना भी क्या जीना सा लगता रहे.

छूट गए सब, समय के साथ साथ और खाली हाथ रह गए
शायद इसको कहते हैं कि हम हाथ मलते रह गए।
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अब सुबह शाम की दवा बताए,कि तेरे बिना भी क्या जीना
यहीं है जीवन के भंवर में,सांसो की नाव को भरसक खेना।
अपर्णा शर्मा
March29th,24

होली

सेव,मठरी,गुजिया और दही बड़े
हथियार थे पिचकारी और गुब्बारे।
कच्ची उम्र में दोस्ती के रंग थे पक्कम पक्के
रंगबिरंगे रंगों से उड़ाते थे हम सभी के छक्के।
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शीतल ठंडाई पी पी होली आती थी अपने रंग में
कांजी होली को खूब नचाती थी फिर अपने संग में।
अब ना बनते वैसे प्यार भरे भंग के कुल्हड़
दूर कहीं सो गए सब, अपनेपन के सारे हो-हुल्लड़।
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अब भी रंगों की कमी कहीं नहीं दिखती
पर बचपन की टोली दिल में बहुत कसकती।
मात्र रिवाज निभाना ही रह गए अब त्योहार
दूर से दो बधाई और संजो लो,यादों का संसार।
अपर्णा शर्मा
March25th,24

फाग

माघ की सुबह की कहानियाँ
फाग की रात का गीत बन रही.
और गांव की कहानी कहती
नारियां फाग के गीत गा रही।

धरा हर ओर छोर से, गुलाल सी
पुष्प,पत्रों में महक रही
मंडराते भौरों और तितलियों संग
कोयल भी बागों में कुहूक रही.
शीत से सिकुड़ी वसुधा अब
अंगड़ाई ले, पलकें यूँ खोल रही
माघ की सुबह की कहानियाँ
फाग की रात का गीत बन रही।

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पौष,माघ में ठिठुरते सभी जीव
प्रेम गीत अब गा रहे
गुलमोहर,पलाश प्रेम के
पाश में बंध आग से दहक रहे
प्रेम का आँगन बनी नवेली वसुधा
त्योहारों की रंगोली सजा रही
माघ की सुबह की कहानियाँ
फाग की रात का गीत बन रही।

गेहूँ की बालियां सरसों संग
खेत में नृत्य कर रही
हिमालय की हिमा भी सब देख
मंद-मंद पिघल रही.
आम की बौराई भी फाग को
और बौरा रही
माघ की सुबह की कहानियाँ
फाग की रात का गीत बन रही

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प्रकृति का नया उल्लास,
नए जीवन का रंग भर रहा
अनुराग मधु से भरी धरा को
मधुर सुरभित कर रहा
वर्ष का अंत इस तरह फाग
के रंगों में घुल रहा.
अनंत वर्णों से सजा पूर्णिमा को
फाग विदा ले रहा।
अपर्णा शर्मा
March 22nd,24

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